NCERT Class-10 Hindi Solution Ch-7: परम्परा का मूल्यांकन Subjective Question and Answer
Soln Date / Update:-25-Aug-2025 06:19PM
Solution:-
Q1. परम्परा का मूल्यांकन का लेखक परिचय लिखें?
पूरा नाम:- डॉ. रामविलास शर्मा हैं,
जन्म:- 10 अक्टूबर 1912 ई० को
जन्म स्थान:- उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद के एक छोटे से गाँव ऊँचगाँव सानी में हुआ था।
मृत्यु:- 30 मई 2000 ई० में
हिंदी आलोचना के एक प्रमुख हस्ताक्षर डॉ० राम विलास शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर 1912 ई० को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद के एक छोटे से गाँव ऊँचगाँव सानी में हुआ था।
उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी०ए० तथा 1934 में अंग्रेजी साहित्य में एम०ए० किया। एम०ए० करने के बाद 1938 ई० तक शोध कार्य में व्यस्त रहे। 1938 ई० से 1943 ई० तक वे लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक के रूप में कार्यरत रहे। इसके बाद वे आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज में अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए और 1971 ई० तक वहाँ अध्यापन कार्य करते रहे।
बाद में, आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति के आग्रह पर उन्होंने के० एम० हिन्दी संस्थान में निदेशक पद का कार्यभार संभाला, जहाँ से वे 1974 ई० में सेवानिवृत्त हुए। सन् 1949 से 1953 के बीच वे भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामंत्री के रूप में कार्यरत रहे। उनका निधन 30 मई 2000 को दिल्ली में हुआ था।
Q2. रामविलास शर्मा की प्रमुख रचनाएँ लिखिए?
रामविलास शर्मा की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित जो कुछ निचे दिया गया है:-
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना
भारतेन्दु हरिशचन्द्र
प्रेमचन्द और उनका युग
भाषा और समाज
महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण
भारत की भाषा समस्या
नयी कविता और अस्तित्ववाद
भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद
भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी
विराम चिह्न
बड़े भाई
Q3. परंपरा का ज्ञान किनके लिए आवश्यक है और क्यों?
उत्तर:- जो व्यक्ति साहित्य में नवीनता लाना चाहते हैं, जो परंपरागत सोच से हटकर नई दिशा में सोचते हैं, और जो जमी-जमाई रूढ़ियों को तोड़कर क्रांतिकारी साहित्य रचना करना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परम्परा का गहरा ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। परम्परा की इस समझ से ही प्रगतिशील आलोचना की नींव रखी जाती है। जब आलोचना का दृष्टिकोण प्रगतिशील होता है, तब साहित्य की दिशा को बदला जा सकता है और समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप नया साहित्य रचा जा सकता है।
उत्तर:- साहित्य का महत्व राजनीति के मूल्यों की तुलना में कहीं अधिक स्थायी और व्यापक होता है। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवि टेनीसन ने महान लैटिन कवि वर्जिल की प्रशंसा में एक सुंदर कविता रची थी, जिसमें उन्होंने यह संकेत दिया कि यद्यपि रोमन साम्राज्य का वैभव अब इतिहास बन चुका है, फिर भी वर्जिल की काव्यधारा आज भी हमारी आत्मा को छूती है और हमारे अंतःकरण में आनंद की तरंगें उत्पन्न करती है।
Q5. एक बहुजातीय राष्ट्र के रूप में भारत की तुलना कोई अन्य देश क्यों नहीं कर सकता?
उत्तर:- विश्व का कोई भी देश भारत जैसी बहुजातीय राष्ट्र-व्यवस्था की तुलना नहीं कर सकता। भारत में राष्ट्रीयता किसी एक जाति के प्रभुत्व से नहीं, बल्कि विविध समुदायों की साझा सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत की नींव पर विकसित हुई है। इस सांस्कृतिक विकास में भारत के कवियों का विशेष योगदान रहा है। यदि भारतीय संस्कृति से रामायण और महाभारत को अलग कर दिया जाए, तो भारतीय साहित्य की आंतरिक एकता विखंडित हो जाएगी। किसी अन्य बहुजातीय राष्ट्र में कवियों की भूमिका इतनी निर्णायक नहीं रही, जितनी भारत में वाल्मीकि और व्यास की रही है।
Q6. किस प्रकार समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है? इस संदर्भ में लेखक के विचारों को स्पष्ट करें।
उत्तर:- समाजवाद भारत की एक आवश्यक राष्ट्रीय आवश्यकता है। पूँजीवादी व्यवस्था में शक्ति और संसाधनों का इतना अधिक अपव्यय होता है कि उसकी गणना कर पाना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, देश के संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग समाजवादी प्रणाली में ही संभव हो पाता है। विश्व के कई छोटे-बड़े राष्ट्र, जो कभी भारत से भी अधिक पिछड़े हुए थे, समाजवादी व्यवस्था अपनाने के बाद अपेक्षाकृत अधिक सक्षम और प्रगतिशील बन गए हैं। उनकी विकास गति आज किसी भी पूँजीवादी देश की तुलना में अधिक तेज़ है। अतः भारत की संपूर्ण राष्ट्रीय क्षमताओं का विकास केवल समाजवाद की दिशा में ही सुनिश्चित हो सकता है।
Q7. निबंध के अंत में लेखक किस प्रकार का स्वप्न देखता है, जो परंपरा के मूल्यांकन से जुड़ा है?
उत्तर:- ‘परंपरा का मूल्यांकन’ निबंध का समापन करते हुए लेखक एक सुंदर स्वप्न देखता है कि भारतवासी अधिक-से-अधिक साक्षर बनें। जब शिक्षा का प्रसार होगा और लोगों को साहित्य पढ़ने के लिए समय तथा साधन उपलब्ध होंगे, तब व्यास और वाल्मीकि जैसे महाकवियों को करोड़ों नए पाठक मिलेंगे। ये पाठक केवल अनुवादों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि मूल संस्कृत भाषा में भी इन कालजयी कृतियों का अध्ययन करेंगे।
Q8. कौन-से लोग अपने सिद्धांतों को ऐतिहासिक भौतिक वाद के नाम से पुकारते हैं?
उत्तर:- जो लोग समाज में बुनियादी बदलाव कर एक वर्गविहीन और शोषणरहित समाज की रचना करना चाहते हैं, वे अपने विचारों को ऐतिहासिक भौतिकवाद के रूप में पहचानते हैं।
Q9. साहित्य का कौन-सा पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है? इस विषय में लेखक का दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर:- साहित्य मानव जीवन के विविध पक्षों से जुड़ा होता है। केवल आर्थिक पक्ष ही नहीं, बल्कि एक जीव के रूप में मनुष्य जिन अनुभवों और भावनाओं से गुजरता है, वे भी साहित्य में अभिव्यक्त होती हैं। इनमें अनेक ऐसी मूलभूत भावनाएँ होती हैं जो सभी प्राणियों में पाई जाती हैं और मनुष्य को समस्त जीवों से जोड़ती हैं। साहित्य का यही मानवीय और भावनात्मक पक्ष अपेक्षाकृत अधिक स्थायी माना गया है।8."साहित्य का विकास उसी प्रकार नहीं होता जैसे समाज का विकास होता है। लेखक का आशय स्पष्ट करें।
Q10. साहित्य का विकास उसी प्रकार नहीं होता जैसे समाज का विकास होता है। लेखक का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:- साहित्य में विकास की प्रक्रिया समाज के विकास की तरह सीधे और सरल रूप में नहीं घटित होती। सामाजिक विकास की दृष्टि से सामन्ती सभ्यता की तुलना में पूँजीवादी सभ्यता को अधिक उन्नत माना जाता है, और पूँजीवादी सभ्यता की तुलना में समाजवादी सभ्यता को। पुराने चरखे और करघों की तुलना में मशीनों के प्रयोग से श्रम की उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई है। फिर भी यह जरूरी नहीं कि सामन्ती युग का कवि, पूँजीवादी युग के कवि की तुलना में कम श्रेष्ठ हो।
उत्तर:- द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद यह मानता है कि मनुष्य की चेतना आर्थिक संबंधों से प्रभावित होती है, परंतु वह उसकी सापेक्ष स्वतंत्रता को भी स्वीकार करता है। आर्थिक संबंधों से प्रभावित होना एक बात है, किंतु चेतना का पूर्णतः उन्हीं द्वारा निर्धारित होना दूसरी बात है। भौतिकवाद का अर्थ भाग्यवाद नहीं है। हर चीज़ परिस्थितियों द्वारा अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं होती। यदि मनुष्य परिस्थितियों का पूर्ण नियंत्रक नहीं है, तो परिस्थितियाँ भी मनुष्य की पूर्ण नियामक नहीं हैं। दोनों के बीच संबंध द्वन्द्वात्मक है। इसी कारण साहित्य भी सापेक्ष रूप से स्वतंत्र होता है।
Q12. साहित्य के सृजन में प्रतिभा की भूमिका को स्वीकारते हुए लेखक किन संभावित खतरों के प्रति सचेत करता है?
उत्तर:- साहित्य की सृष्टि में प्रतिभाशाली व्यक्तियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि ऐसे व्यक्ति जो कुछ भी रचते हैं, वह सर्वथा श्रेष्ठ ही होता है या उनके श्रेष्ठ कृतित्व में दोष नहीं होते। कला का पूर्णतः निर्दोष होना भी एक दोष है। ऐसी कला निर्जीव होती है। आजकल व्यक्ति पूजा की काफी निंदा की जाती है। किंतु जो लोग सबसे ज्यादा व्यक्ति पूजा की निंदा करते हैं, वे सबसे ज्यादा व्यक्ति पूजा का प्रचार भी करते है।
उत्तर:- जैसे एक भाषा बोलने वाली जाति की अपनी एक अस्मिता होती है, वैसे ही अनेक भाषाएँ बोलने वाले राष्ट्र की भी एक राष्ट्रीय अस्मिता होती है। आज के समय में बहुत से राष्ट्र बहुजातीय और बहुभाषी हैं। जब राष्ट्र पर संकट आता है, तो उस समय लोगों को अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का गहरा अनुभव होता है। लेखक के अनुसार, जातीय और राष्ट्रीय अस्मिताएँ अलग होते हुए भी दोनों में यह समानता है कि दोनों संकट के समय अधिक प्रकट होकर सामने आती हैं।