NCERT Class-10 Hindi Ch-4: नाखून क्यों बढ़ते हैं Subjective Question Answer
Soln Date / Update:-22-Aug-2025 10:45AM
Solution:-
Q1. नाखून क्यों बढ़ते हैं लेखक का परिचय बताएं?
उत्तर:- नाखून क्यों बढ़ते हैं लेखक का परिचय:-
पूरा नाम: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
जन्म: 19 अगस्त, 1907 ई० में
जन्म स्थान: छपरा गाँव, बलिया (उत्तरप्रदेश)
पिता का नाम: पंडित अनमोल द्विवेदी
Q2. नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के सामने कैसे आया?
उत्तर:- जब लेखक की छोटी लड़की ने लेखक से अचानक प्रश्न कर दी कि नाखून क्यों बढ़ते हैं। तब से यह प्रश्न लेखक के आगे उपस्थित हुआ।
Q3. बढ़ते हुए नाखूनों के माध्यम से प्रकृति मनुष्य को क्या स्मरण कराना चाहती है?
उत्तर:- मनुष्य का नाखून लगातार बढ़ रहा है। प्रकृति मनुष्य को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर पा रही है। बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता है। तुम वही लाख वर्ष पहले वाले नख दंतावलम्बी जीव हो जो पशु के साथ एक ही सतह पर रहते थे और विचरण करते थे।
Q4. मनुष्य को नाखून बार-बार काटने की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:- आज मनुष्य को नाखून से भी कई करोड़ गुणा शक्तिशाली हथियार मिल चुका है। उसे अब इस नाखून की कोई जरुरत नहीं है। इसलिए मनुष्य बार-बार नाखूनों को काटता है।
Q5. नख बढ़ाना तथा काटना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ क्यों मानी जाती हैं? इनका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:- सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को कहते हैं। शरीर ने अपने भीतर ऐसा गुण पैदा कर लिया है जो शरीर के अनजाने में भी अपना काम करते रहता है। जैसे नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना, दाँत का दुबारा उठना, पलकों का गिरना इत्यादि । नाखून का बढ़ना पशुता की निशानी है और उन्हें काटना मनुष्यता की निशानी है। परंतु मनुष्य के नाखून को चाहे जितनी बार काट दो, वह मरना नहीं जानती है। अर्थात् मनुष्य में आज भी पशु का गुण मौजूद है।
उत्तर:- 'सफलता' और 'चरितार्थता' मनुष्य के जीवन के दो पहलू है। अगर कोई व्यक्ति अपने प्रयास से जो कुछ भी प्राप्त करता है अर्थात अपनी मंजिल को पा लेता है तो यह उसकी सफलता है। सफलता के लिए मनुष्यता का होना आवश्यक नहीं है। अगर कोई व्यक्ति दूसरों के सुख-दुख को अपना सुख-दुख, उसकी उन्नति को अपनी उन्नति समझता हो तो यह उसकी 'चरितार्थता' है। चरितार्थता के लिए मनुष्यता का होना आवश्यक है।
Q7. लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है?
उत्तर:- कुछ लाख वर्ष पहले जब मनुष्य जंगली था वनमानुष जैसा । उस समय उसे अपने जीवन रक्षा के लिए नाखून बहुत जरुरी था । उन दिनों उसे जूझना पड़ता था, एवं अपने प्रतिद्वंदियों को पछाड़ना पड़ता था जिसके लिए नाखून एक आवश्यक अंग था । अतः लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कुछ हद तक संगत है।
उत्तर:- वात्स्यायन के कामसूत्र से ज्ञात होता है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व भारतवासी अपने नाखूनों को सुंदरता और सुकुमार विनोदों के लिए सजाते-सँवारते थे। नाखूनों को काटने और उनके रूप देने की कला मनोरंजन का एक रूप मानी जाती थी। वे अपने नाखूनों को त्रिकोण, गोल, अर्धचंद्र, दंतुल जैसे विभिन्न आकारों में तराशते थे। साथ ही, उन्हें मोम और आलता से रगड़कर लालिमा और चमक प्रदान करते थे।
Q9. लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।
उत्तर:- लेखक ऐसा इसलिए पूछता है कि जहाँ नाखून का बढ़ना पशुता की निशानी है वहीं इसे काटना मनुष्यता की निशानी है । अस्त्र-शस्त्र के रूप में कारतूस, बम, तोप, एटम बम ये सभी हमारी पशुता को आगे बढ़ाने का काम किया है । इसका नवीनतम उदाहरण है, हिरोशिमा हत्याकाण्ड । अतः ये नाखून भयंकर पाशवी वृत्ति के जीवंत प्रतीक है। मनुष्य की पशुता को चाहे जितनी बार भी काट दो वह मरना नहीं जानती है।
उत्तर:- एक बूढ़ा था । उसने कहा था- बाहर नहीं, भीतर की ओर देखो । हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोध और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात मत सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्म-तोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो। उसने कहा- प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। उच्छृंखलता पशु की प्रवृति है, 'स्व' का बंधन मनुष्य का स्वभाव है। बूढ़े की बात अच्छी लगी या नहीं, पता नहीं उसे गोली मार दी गई। आदमी के नाखून बढ़ने की प्रवृति ही हावी हुई । लेखक हैरान होकर सोचता है – बूढे ने कितनी गहराई में पैठकर मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था।
उत्तर:- प्राणिशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि मनुष्य का अनावश्यक अंग उसी प्रकार झड़ जाएगा, जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़ गई है। उस दिन मनुष्य की पुशता भी लुप्त हो जाएगी । शायद उस दिन वह मरणास्त्रों का प्रयोग भी बंद कर देगा। मनुष्य में जो घृणा है, जो अनायास-बिना सिखाए आ जाती है, वह पशुत्व का सूचक है और अपने को संयत रखना, दूसरे के मनोभावों का आदर करना मनुष्य का स्वधर्म है। अभ्यास और तप से प्राप्त वस्तुएँ मनुष्य की महिमा को सूचित करती हैं।
Q12. देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या है?
उत्तर:- देश की आजादी के लिए प्रयुक्त स्वाधीनता, इन्डिपेन्डेन्स और सेल्फ डिपेण्डेन्स शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है। इन्डिपेन्डेन्स का अर्थ है अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव लेकिन स्वाधीनता का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। अंग्रेजी में Self Dependence कह सकते है । भारतवर्ष ने Independence को अनधीनता के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं किया बल्कि स्वाधीनता के रूप में स्वीकार किया। वह स्व के बंधन को आसानी से छोड़ नहीं सकता है।
उत्तर:- पुराने से चिपके रहने के संदर्भ में लेखक ने उस बंदरिया का उल्लेख किया है जो अपने मृत बच्चे को सीने से चिपकाए घूमती है। लेखक का मानना है कि ऐसी बंदरिया मनुष्य का आदर्श कभी नहीं बन सकती। वह मृत और जीवित में कोई अंतर नहीं कर सकती। लेकिन मनुष्य में चिंतन शक्ति होती है। वह सजीव और निर्जीव में अंतर कर सकता है, समझ सकता. है कि क्या उपयोगी है तथा क्या अनुपयोगी । वास्तव में पुरातन और नवीन की अच्छी बातों को ग्रहण करना तथा बेकार की बातों का त्याग करना ही मनुष्य का आदर्श है।